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हाजीपुर में पत्रकार के घर शराबबंदी छापेमारी पर बवाल, राजद ने सरकार और प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

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हाजीपुर में पत्रकार के घर शराबबंदी कानून के तहत हुई छापेमारी को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। राजद ने इसे भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताया है, जबकि जांच में शराब सेवन की पुष्टि नहीं हुई।

हाजीपुर/आलम की खबर:वैशाली जिले के हाजीपुर में एक पत्रकार के घर शराबबंदी कानून के तहत की गई छापेमारी अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। इस घटना ने बिहार की राजनीति को गर्मा दिया है, जहां राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने राज्य सरकार और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राजद का दावा है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को उजागर करने वाले पत्रकार को जानबूझकर निशाना बनाया गया है, जिससे प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मामला हाजीपुर के राजेंद्र चौक इलाके का है, जहां मंगलवार देर रात उत्पाद विभाग और नगर थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की। जानकारी के अनुसार, करीब 10 बजे पांच वाहनों में पहुंची टीम ने पत्रकार मनीष कुमार सिंह के किराए के मकान पर छापेमारी की और पूरे घर की तलाशी ली। इस दौरान घर में उनकी पत्नी और बच्चे भी मौजूद थे, जिससे परिवार को काफी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा।

जांच के दौरान पुलिस ने पत्रकार का ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट भी किया, जिसमें अल्कोहल की मात्रा शून्य पाई गई। इसके बावजूद पूरी कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि जब कोई भी आपत्तिजनक सामग्री या शराब सेवन का प्रमाण नहीं मिला, तो इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की गई। इसी बिंदु को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।

राष्ट्रीय जनता दल ने इस घटना पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करार दिया है। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि जो पत्रकार प्रशासनिक और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को उजागर कर रहे थे, उन्हें दबाने के लिए यह कार्रवाई की गई। राजद ने दावा किया कि वैशाली डीएम कार्यालय के रसोइया बहाली से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की खबर सामने लाने के बाद पत्रकार को निशाना बनाया गया।

राजद ने अपने पोस्ट में तीखी भाषा का उपयोग करते हुए कहा कि बिहार में अफसरशाही हावी हो चुकी है और आम नागरिकों की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। पार्टी का आरोप है कि शराब सेवन का झूठा आरोप लगाकर पत्रकार को गिरफ्तार करने की कोशिश की गई, जबकि जांच में यह पूरी तरह गलत साबित हुआ।

पत्रकार मनीष कुमार सिंह ने भी इस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यह छापेमारी किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत नहीं बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर करने की सजा के रूप में की गई है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार को बिना किसी कारण देर रात परेशान किया गया, घर की तलाशी ली गई और बच्चों व पत्नी के सामने पूरे माहौल को तनावपूर्ण बना दिया गया।

स्थानीय स्तर पर भी इस घटना को लेकर चर्चा तेज है। कई लोगों का मानना है कि यदि जांच में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला, तो इतनी बड़ी कार्रवाई की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वहीं कुछ लोग इसे शराबबंदी कानून के सख्त पालन से जोड़कर देख रहे हैं।

फिलहाल प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन, उसकी प्रक्रिया और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल एक छापेमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकार, प्रशासन और विपक्ष के बीच टकराव का एक नया विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इस पर और राजनीतिक बयानबाजी होने की संभावना है।

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